रविवार, 4 मार्च 2012

होली

वैसे तो होली का नाम याद आ जाने मात्र से मन पर एक अलग ही नशा का एहसास होने लगता है परन्तु मुझे अपने गाँव की होली का त्यौहार अनेक सालों तक दूर रहने के कारण कुछ ज्यादा ही टीसता है। परन्तु क्या  कर सकते हैं। जीवन की अपनी सीमायें होती हैं। गाँव में घूम-घूम कर सबके दरवाजे तक जाना  और सबके घर पर होली गाया जाना बहुत अच्छा लगता था। निश्चित रूप से कस्बाई और शहरी जीवन में वह बात नहीं होती है। प्रथमतः तो यह कि किसी को इस बात से ज्यादा मतलब नहीं होता है कि कोई होली पर उसके घर क्यों नहीं आया। जबकि गाँव में इस बाबत झूठ नहीं चल सकती है। किसी न किसी स्रोत से पता चल ही जाता है कि फलां दोस्त या सम्बन्धी या पारिवारिक व्यक्ति इस कारण से होली पर नहीं आया जो बहुत ही अन्यथा लगने वाली बात होती है। क्या शहरी जीवन में इस बात को कोई महत्व देगा। साथ ही अगर किसी तकलीफ से कोई नहीं आया तो तुरंत उसके बारे में जानकारी कर अपेक्षित सहयोग के साथ उसे हिम्मत बढाने वाला व्यवहार अपनाया जाता। आज होली  की  याद गाँव से दूर रहकर ज्यादा आती है। निश्चित रूप से अब गाँव में भी पहले वाली बात नहीं है  लेकिन   अभी भी गाँव में शहर से ज्यादा अपनत्व  तो है ही।
हालाँकि अब गाँव में भी पहले वाले होली गायक नहीं रहे। परम पूजनीय विरंचि नारायण मिश्र जी नहीं रहे। वैसे तो समय किसी का इन्तजार नहीं करता है परन्तु अतीत हमेशा विछ्ड़ने पर जायदा सालता है।

1 टिप्पणी:

  1. बिलकुल सही ! गाँव अब गाँव नहीं रहे ! जैसे वीरान हो गए है !

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