शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

बहुत समय के बाद आज मैं अपने ब्लॉग पर आया हूँ | समयाभाव के  कारण लिखने के लिए मन में बहुत कुछ संजोये होने के बावजूद उदगार शब्दों का रूप नहीं ले पाते है | इसकी मन में कसक रहती है | यह भी ईच्छा होती है की देश के सुदूर अंचलों का भ्रमण किया जाय तथा वहां की जीवन पद्धति से रूबरू होकर अपने को विस्तारित किया जाय | देखे भगवान कब तक इसे सार्थक बनाते हैं |
इस क्रम में मैंने यात्रा सम्बन्धी अनेकों ब्लॉग भी पढ़े | जानकारी भी जुटाई | इसी दिशा में अनुभव बढ़ाने की इच्छा भी जाग्रत हुई है | इसके फलित होने की उत्कंठा पाले हुए हूँ | 

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

सेवा काल का उत्तरार्द्ध


राज्य सेवा में रहते हुए रिटायरमेंट सन्निकट होने पर मानसिक स्थिति में परिवर्तन महसूस होने लगा है | हालांकि वित्तीय दायित्त्व का दबाव नहीं है | परन्तु अन्य शर्तों का दबाव तो है ही | रिटायरमेंट के बाद का जीवन बच्चों के सहयोग पर बहुत कुछ निर्भर करता है | बुढ़ापे में अनिश्चय और लाचारी की आशंका से सामान्यतया हर व्यक्ति सशंकित रहता है | इसीलिए भगवान् भी  बहुत याद आते है |  कभी कभी लगता  है कि बुढ़ापे में इंसान आस्तिक ज्यादा  हो जाता है | यह नजदीक से चरितार्थ होते महसूस हो रहा है |           इसी क्रम में मन में यह बात अनेकों बार आई कि हम लोग तो भगवान् की पूजा में समाधान ढूढ़ लेते है लेकिन अन्य धर्मावलम्बी किस तरह से इन्ही प्रक्रियाओं से गुजरते हैं | यहाँ मुझे यह लिखते हुए झिझक नहीं हो रही है कि अन्य धर्मों की बारीकी से हम बहुत काम वाकिफ है | अन्य लोग बुढ़ापा कैसे गुजारते है | उनके  धार्मिक जीवन का दैनिक आचार व्यवहार कैसा होता है | 




शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

गया में पिंडदान

                              माता - पिता के स्वर्गवास के बाद से ही मन में बहुत इच्छा थी कि गया जाकर पिंडदान कर आया जाय जिससे जीवन का महत्त्वपूर्ण दायित्त्व पूर्ण हो जाय । भगवत कृपा से यह कार्य इस वर्ष पूर्ण हुआ । यहां  कुछ  संस्मरण आप सबसे बाँट रहा हूँ । 
                              सर्वप्रथम गांव में अपने पितरों का आह्वान किया ।  गांव के समस्त घरों पर जाकर पूर्वजों को गया पधारने के लिए अक्षत छिड़क कर  निमंत्रण दिया । सभी गांववासियों ने अपना आशीर्वाद एवं सहयोग  प्रदान किया । अंत में हमारे कुलदेवता बाबा रैनाथ ब्रह्म को शीश नवा कर उनका आशीर्वाद लिया । 




फल्गु नदी में श्राद्ध करते हुए 



फल्गु नदी किनारे श्राद्ध करते हुए 


वैतरणी के तट पर सामूहिक पिंडदान करते हुए लोग


वैतरणी के तट पर गोदान करते हुए



अक्षयवट के परिसर में पिंडदान करते हुए 




अक्षयवट के नीचे 


बोध गया मंदिर परिसर में 
पूरा परिवार 



सीताकुंड में पिंडदान हेतु रेत निकालते हुए 




सीताकुंड तट पर पिंडदान करते हुए 



प्रेतशिला पर पिंडदान करते हुए लोग 




बुधवार, 24 अगस्त 2016

अभी हाल में मुझे अपने गांव जाने का अवसर प्राप्त हुआ । वहां संयोग से 15 अगस्त को बाबा रैनाथ ब्रह्म का वार्षिक पूजन समारोह था । बहुत लम्बे अन्तराल के बाद मुझे इस अवसर पर गांव में रुकने का अवसर मिला । अनेक लोगों से मिलने का दुर्लभ अवसर मिला । कुछ पारिवारिक जरुरतों के कारण मैं पर्याप्त समय नहीं दे पाया । ऐसे समय में इस बात का अहसास हो ही जाता है कि जीविका के लिये गांव से दूर जाना क्या होता है । लम्बे समय तक जीविका के लिये दूर रहने पर वहां की स्थानीय परिस्थितियों के नजदीक होने से अपनी पत्नी, बच्चे तक गांव के इस लगाव से दूर हो जाते हैं । अनेक अवसरों पर अपने बीबी-बच्चे तक हमारी भावनात्मक लगावों को समझ नहीं पाते जिससे असन्तोष होता है । हालांकि गांव से बाहर जाने और जीविकोपार्जन करने से ही जीवन की भौतिक जरुरतें पूरी होती हैं ।
आज मैं अपने गांव के युवा साथियों द्वारा फ़ेसबुक पर बनायी गई बनकटा मिश्र नाम के ग्रुप की चर्चा भी करुंगा । ग्रुप के कारण गांव में तथा गांव से दूर रहने वाले लोगों के लिये यह ग्रुप एक अच्छे मंच की भूमिका अदा कर रहा है जिससे जुड़कर लोग अपने को गांव की वर्तमान गतिविधियों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं तथा अपडेट हो जाते हैं ।
यहां मैं यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि इस मंच को और अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है । इस मंच पर अधिकाधिक बातें धार्मिक ही होती हैं । बाबा रैनाथ ब्रह्म की पूजा-अराधना, साईं बाबा, शिव मन्दिर, महावीर मन्दिर आदि में पूजा अर्चना आदि । वैसे तो यह भी सच है कि गांव के ज्यादा लोगों को इससे ही मतलब होता है । इन्हीं बातों से मनोरंजन होता है । परन्तु आज के युग को देखें तो इसके साथ अन्य पक्षों का इसमें शामिल होना भी आज की महती आवश्यकता है ।
आज के समय में इस मंच को शिक्षा एवम कौशल से जोड़ने पर गांव के युवाओं को एक अच्छी दिशा मिल सकती है । सभी युवाओं का अपना डिजिटल पता जैसे इमेल होना अति आवश्यक है । टाइप करना अक्षर ज्ञान होने के समान है । वर्ड और एक्सेल का ज्ञान भी इसी श्रेणी में वर्गीकृत किये जाने योग्य है । कम्प्यूटर में कोडिंग की शुरुआत योग्य एवम वरिष्ठ बच्चों के सहयोग से किया जा सकता है । बच्चों में न्यूनतम योग्यता अर्जित करने का यह एक अच्छा मंच भी हो सकता है ।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पूर्वांचल के माता-पिता अपने बच्चों के शिक्षा पर अपनी क्षमता से बहुत अधिक खर्च करने को तत्पर रहते हैं । इस कार्य में अपना गांव वैसे भी अग्रणी है । भले ही माता-पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो परन्तु वह अपने बच्चे की शिक्षा पर व्यय करने में कोताही नहीं बरतता है । जरुरत है इस तरह के संस्कृति के विकसित करने की । आज के नौनिहाल इन्टरनेट पर उपलब्ध दूषित, घटिया जैसे पोर्न, हैकिंग आदि की तरफ़ जल्दी और ज्यादा आकर्षित हो जाते हैं । अगर इन्टरनेट और योथ बनकटा मिश्र ग्रुप जैसे ताकतवर मंच का उपयोग नौनिहालों को सशक्त बनाने में उपयोग हो सके तो कितना अच्छा होगा । बच्चों को अपने शिक्षा के प्रारम्भिक सोपान पर ही ऐसा अवसर मिले तो उनमें आत्म विश्वास बढ़ेगा । इस दिशा में हमारे गुरुजन, उच्च शिक्षित बच्चे शुरुआती पहल कर सकते हैं । गांव से बाहर निकल कर शिक्षा प्राप्त कर रहे अथवा जीविकोपार्जन कर रहे युवा अपने अनुभवों को अपने कनिष्ठ साथियों के साथ शेयर करें तो उनका अच्छा मार्गदर्शन होगा । बहुत अच्छा होने पर यह एक मिसाल भी बन सकता है |

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

बहुत दिनों बाद आज फिर से इस ब्लोग्ग पर आया हूं । पिछले काफ़ी समय से कुछ लिखने की ईच्छा होती है । परन्तु अन्य सामयिक विषय के कारण लिखना स्थगित हो जाता है ।
यहां मैं यह भी उल्लेख करना उचित समझता हूं कि गत सर्दियों में मैंने सपरिवार दक्षिण भारत की यात्रा की थी जो अनुभव बढ़ाने के लिये तो पर्याप्त थी परन्तु मन भर नहीं पाया । तिरुपति, चेन्नै, महाबलीपुरम, कोयम्बटूर, उटकमन्ड, मदुरै, रामेश्वरम, कन्याकुमारी, कोवालम बीच, एलेप्पी आदि स्थानों की सरसरी तौर पर यात्रा की गई । बेटी की पढ़ाई अगर बाधक नहीं होती तो सर्दियों में और अधिक समय तक दक्षिण के सुखद गुनगुने तापमान का आनन्द लिया जाता ।

खैर यह रही पिछले दिनों की बात । वर्तमान में मुझे अपने माता-पिता के पिन्डदान करने की चिर प्रतीक्षित अभिलाषा पूरी करने की तीव्र उत्सुकता है । मैं जितनी भी जानकारी जुटाने की कोषिश कर सकता हूं कर रहा हूं । परन्तु अनेक बातें हैं जो मन को तसल्ली नहीं दिला पा रही हैं । पिन्डदान का कर्मकान्डी पक्ष, आध्यात्मिक पक्ष के साथ-साथ पारिवारिक और वैचारिक स्तर पर भी चुनौतियों का सामना करना पर रहा है । क्या तरीका रहे जिससे सभी सन्तुष्ट रहें । पिन्डदान केवल पुत्र के करने से नहीं हो सकता है जबतक कि सभी लोगों का समवेत स्वर अनुकूल नहीं हो । पारिवारिक स्तर पर चल रही व्यवस्था भी बाधित नहीं होनी चाहिये यथा बच्चों की शिक्षा ।  गया से जुड़ी जानकारियां भी जुटानी पड़ रही है ।  इसी उहापोह में समय व्यतीत हो रहा है । 

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

जोधपुर यात्रा- 

मेहरानगढ़ एवम जसवन्त थड़ा 

बहुत समय से पश्चिमी राजस्थान के दर्शनीय स्थलों को देखने की ईच्छा थी । परन्तु विभिन्न बाध्यताओं के कारण सफ़ल नहीं हो पा रहा था । बेटी के कारण जोधपुर जाने की बाध्यता होने से ही यह सम्भव हो पाया । बेटे को भी समय मिल जाने से पूरी इकाई का साथ मिल गया । लगा कि सभी को आनन्द आयेगा । जोधपुर का सर्वप्रमुख दर्शनीय स्थल मेहरान गढ़ का किला है । हम सबने देखा । उसके पास ही जसवन्त थड़ा है । बच्चे वहां तक आते-आते थक गये । अति खूबसूरत स्थान को भी देखने में उनके थकने के कारण आनन्द सीमित हो गया । यद्यपि मैं भी थक गया था परन्तु ऐसे अवसर दुर्लभ होने के कारण थकावट को इस पर हाबी नहीं होने देना चाहता था । इसकी कुछ झलकियों से आप को रुबरु करा रहा हूं । हो सकता है कि आप भी अपने को मानसिक रुप से जोध्पुर में पायें । 
                              सबसे ज्यादा धन्यवाद राजा को जिन्होंने इन स्थलों को व्यावसायिक रुप देकर तथा आधारभूत सुविधाओं का सृजन कराकर आम जन को इससे जोड़ा है । जोधपुर जैसे शहर में इससे बहुतों को रोजगार मिला है तथा शहर की खूबसूरती को चार चांद लग गया है ।     
मेहरान गढ़ किला के बाहर से लिया गया फोटो 



 जहां राजा का दरबार लगता था 
 राजा का शयन कक्ष (बेड )
 जनानी ड्योढ़ी 

किला के ऊपर स्थित तोप 


जसवंत थड़ा 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

थामस एल. फ़्रीड्मन लिखित "द वर्ड इज फ़्लैट" 

                                         इस पुस्तक को प्रकाशित होने के लम्बे अन्तराल के बाद मुझे इस पुस्तक के बारे में पता चलने पर मैंने इसे पढ़ा । निश्चित रुप से यह पुस्तक मेरे आज तक के पढ़े पुस्तकों में से अविस्मरणीय रुप में याद रहेगी । 
                                  इस पुस्तक को मैं आज के सभी युवाओं एवम सक्रिय लोगों के लिये आवश्यक समझता हूं । यह पुस्तक आज के जीवन को, विशेष रुप से इसके तकनीकी एवम वैश्विक आयाम को समझने में सहयोगी है । इन्टरनेट आज किस तरह से रचनात्मक एवम विध्वंसात्मक साधन के रुप में सभी को सुलभ है । आज मैनुफ़ैक्चरिंग, हार्डवेयर या साफ़्टवेयर यहां तक कि कृषि भी कैसे वैश्विक हो गयी है इसे सहजता से समझा जा सकता है । 
                                       हम सभी कैसे इसके अंग के रुप में क्रियाशील हैं । आज सुपर पावर भी विस्तृत स्तर पर युद्ध करने की नहीं सोच सकते । तकनीक और विकास जीवन के हर पक्ष पर हावी हो गया है । आज उच्च जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों पर क्यों ज्यादा धन खर्च किया जा रहा है, रिसर्च हो रहा है जबकि बहुत बड़ी संख्या में लोग मलेरिया जैसे बीमारियों से मर रहे हैं जिसपर अगर इसी शिद्दत से रिसर्च होता तो बहुत आसानी से इस पर कंट्रोल किया जा सकता है ।