शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

 प्राइवेट से सरकारी स्कूलों की प्रतिस्पर्धा 

                                             मैंने अपनी  पूरी शिक्षा सरकारी स्कूलों से ही प्राप्त की है । सरकारी स्कूल में कभी भी अलग से किसी काम के लिए अतिरिक्त धन की मांग नहीं की जाती है । परन्तु प्राइवेट स्कूल में प्रत्येक काम के लिए पहले धन की बात की जाती है , बाद में काम की । यहाँ मैं अपने गांव के स्कूल के पास में महुआबारी में खुले प्राइवेट स्कूल की बात करुँ या भाटपाररानी में चल रहे प्राइवेट स्कूल की बात करुँ । मूल बात एक ही है । प्राइवेट स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से अध्यापन कराया जाता है । यह आज की सबसे ज्यादा मांग है । सभी यही चाहते है कि उनका नौनिहाल अंगरेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर ऊँचे ओहदे पर पहुंचे तथा आरामदेह जीवन जीये । 
                                          कहाँ गांव के स्कूल की दीवालें जीर्ण - शीर्ण, अध्यापक योग्य होते हुए भी उत्साहित नहीं हैं तथा साधनों की कमी है । जबकि प्राइवेट स्कूल की दीवालें चमकती हुई है तथा स्कूल में ड्रेस कोड में दमकते बच्चे बरबस ही अपनी ओर सभी का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं । भले ही अध्यापक जिन्हे सरकारी स्कूलों में स्थान नहीं मिल पाया है । उन्हीं के भरोसे हम अपने नौनिहालों को  समर्पित कर इठलाते हैं । मेरा यह मंतव्य कत्तई नहीं है कि प्राइवेट स्कूल किसी मायने में सरकारी स्कूलों से पीछे हैं । परन्तु अंधी दौड़ में चाहे - अनचाहे हम सभी शामिल हो जाते हैं । 
                                                    वैसे हमारे गांव के पास में महुआबारी में प्राइवेट में संचालित स्कूल की बिल्डिंग काफी अच्छी तथा सुविधाएं भी बेहतर बताई जाती हैं । गांव के बहुत सारे बच्चे इस स्कूल में पढते है । ज्यादा सक्षम परिवार के बच्चे भाटपाररानी में प्राइवेट स्कूल में पढने जाते हैं । ऐसी स्थिति में गांव का स्कूल क्यों कर बेहतर हो सकेगा ? क्योंकि मेधावी बच्चे  पहले ही बाहर के स्कूल में चले जाते है । अतः मेरा सपना कि गांव के बच्चे एक दिन दुनियां के कोने - कोने में सक्षम स्थिति में दीखे, कैसे सच हो सकेगा ? हम सभी तो इसी कारण अपने गांव को छोड़कर बाहर में जीवन यापन कर रहे है । साथ ही अपने बच्चों को भी गांव से जोड़ नहीं सके है । अतः हमारा तो इस बाबत सोचना भी गलत है । 

महुआबारी में प्राइवेट स्कूल की दमकती दीवालें 


महुआबारी स्थित प्राइवेट स्कूल 


महुआबारी स्थित प्राइवेट स्कूल 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

बनकटा मिश्र गांव का प्राथमिक एवं मिडिल स्कूल 

                              आज हम लोग गांव के पूर्व में स्थित सरकारी स्कूल के  बारे में चर्चा करेंगे । जब हम लोग पढते थे तब यह प्राइमरी स्कूल था । वर्तमान में यह स्कूल क्रमोन्नत होकर मिडिल स्कूल हो गया है । पूर्व में इस स्कूल में आस-पास के कई  गांवों के छात्र छात्राएं पढ़ा करते थे । परन्तु अब आस-पास में अनेक स्कूल खुल गए हैं । अब यह स्कूल बनकटा मिश्र तथा बेदवलिया गांव के बच्चों की शिक्षा की जरूरतों को पूरा कर रहा है । 
                              यह विद्यालय मेरा अल्मा मेटर है । मेरे जीवन की नींव इसी विद्यालय से शुरू हुई । इसकी यादें अविस्मरणीय रहेंगी । इसको बहुत फूलता फालता देखने की इच्छा है ।  यहाँ के छात्रों को दुनियाँ के अनेक स्थानों  पर  महत्त्वपूर्ण क्षमता में काम करते  और अपना स्थान  बनाते देखने की दिली इच्छा है । हमारे गांव के बच्चों के  लिये शिक्षा के अतिरिक्त अन्य विकल्प बहुत   सीमित है । 


प्राथमिक विद्यालय बनकटा मिश्र, जिला देवरिया    



पूर्व माध्यमिक (मिडिल)  विद्यालय बनकटा मिश्र, जिला देवरिया    

बनकटा मिश्र, जिला देवरिया  के सरकारी स्कूल का विहंगम दृश्य



























दीर्घेश्वर मन्दिर रवनी, मझौली राज, सलेमपुर, जिला देवरिया 
                        अपने बचपन के बाद मुझे याद नहीं है कि मैंने इस मन्दिर को बहुत अच्छे से देखा हो । इस मन्दिर के बारे में बचपन की याद बहुत नोस्टाल्जिक (अतीत को याद करने की भावना) कर देती है । हम लोग पूरे साल अरन्डी के बीज इकट्ठा करते । इसके लिये हम लोग अरन्डी के बीज को खेल- खेल में एक दूसरे से जीतते एवम इकट्ठा करते । रवनी के शिव मन्दिर पर शिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता था । सब लोग उसमें जाते थे । हम लोगों को घरवालों से कुछ पैसे मिल जाते तथा कुछ पैसे इस अरन्डी को बेचकर प्राप्त कर लेते । 
                         मेले में हम लोग बासुरी (पिपिहरी) को खरीदते । वापसी के समय पर पिपिहरी बजाते आते उस खुशी को आज हम किसी भी खुशी से अतुलनीय पाते हैं । आज उस स्थान का विकास भी आधुनिक तरीके से हो गया है । आज बहुत सालों बाद गया तो वहां टीले जैसे ऊचे स्थान पर चढने की जरुरत ही नहीं हुई और न हीं टीले पर से नीचे उतर कर मन्दिर मे जाने का रोमांच मिला । हालांकि आज हम कह सकते हैं कि पहले से आरामदेह हो गया है ।
                           इसका मतलब यह नहीं है कि मैं आज के हुए विकास से सहमत नहीं हूं । निश्चित रुप से विकास से अतीत को उसी रुप में पूरी तरह से संजोया नहीं जा सकता हैं । आज यह मन्दिर पूरे इलाके के लिये एक दर्शनीय स्थल के रुप में विकसित हो गया है । शिवजी की कृपा इसी तरह और स्थलों को भी प्राप्त होती रहे । आइए आज इस मन्दिर का दर्शन करें ।  

दिर्घेश्वर  मंदिर , रवनी , मझौली राज , सलेमपुर , देवरिया 


दिर्घेश्वर  मंदिर , रवनी , मझौली राज , सलेमपुर , देवरिया   

शिव मंदिर बनकटा मिश्र 
                   जैसा कि मैंने आप को पिछले पोस्ट में गाँव में सभी दिशाओं में मंदिरों के निर्माण एवं उसके सामुदायिक महत्त्व के बारे में अवगत कराया था । इस पोस्ट में मैं आप को गांव के उत्तर दिशा में विकसित हो रहे शिव मंदिर के बारे में बताएँगे । गांव के ही तिवारी जी अपने रिटायरमेंट के बाद अपना सब कुछ छोड़ कर नदी किनारे धूनी लगा कर मंदिर निर्माण की सपने जैसी लगने वाली आत्म मुक्ति की धुन में लग गए और आज इस पर गांव के सभी लोगों का विशेष ध्यान हो गया है । गांव की सामूहिकता के विकास के लिए यह मंदिर एक केंद्र बिन्दु का स्थान प्राप्त कर लिया है । 
                      आइए आज हम लोग इस मंदिर और इसकी  अदभुत चमत्कारिक मूर्तियों का दर्शन स्वयं करें । 


हनुमान जी की मूर्ति 


राधा कृष्ण की मूर्ति 




शिव जी की मूर्ति 



   शिवजी की मूर्ति 


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

बनकटा मिश्र से भटनी वाया दनउर  के लिए छोटी गंडक पर बना पुल का महत्त्व 


                           पिछली पोस्ट में मैंने आप को गांव के पश्चिम मे विकसित किये जा रहे साई बाबा के मन्दिर का जिक्र किया था । इस बार मैं आप को मन्दिर के पास से गुजर रहे नव विकसित परन्तु भविष्य के लिये असीम संभावनाओं को अपने गर्भ में समेटे हुए बनकटा मिश्र एवम भटनी के बीच वाया दनउर के लिये छोटी गन्डक नदी पर बने पुल के बारे में चर्चा करुंगा ।

                          आज से पच्चीस तीस वर्ष पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि आज हम लोग रोड से बनकटा मिश्र से भटनी की यात्रा अपने मोटरसाइकिल या जीप कार से कर सकेंगे ।  परन्तु यह आज की वास्तविकता है । आज हम कहीं से आवें तो भटनी से अपने साधन से और शीघ्र ही सार्वजनिक साधन से भी अपने गांव बनकटा मिश्र आसानी से आ सकते हैं । 
                           इस विकास से भविष्य में नये आयाम भी जुड़ेंगे । पहले बनकटा मिश्र सीधे भाटपार रानी एवम सलेमपुर से जुड़ा था । गांव का सीधा सम्पर्क दनउर, नोनापार एवम भटनी से नहीं था । परन्तु अब हो जायेगा ।
                            इस पक्ष की बानगी पुल के शुरु होते ही अनेक ठेलों एवम दुकानों के चालू हो जाने से ही लग जाती है । विकास का यह पक्ष बहुत सुन्दर लगता है । हमें यह कल्पना करने से ही रोमांच हो जाता है कि कभी हम सब्जी लेने के लिये एवम चाय पीने के लिये महुआबारी जाते थे तथा वहां की अधिकांश सब्जियों के खरीददार हमारे गांव के लोग हुआ करते थे ।   

पुल की झलकियां 


पुल के उपर बांयें से दांयें  ब्लोगर , ब्लोग्गर के मामा जी के सुपुत्र श्री रामप्रकाश शुक्ल जी, श्री उमेश मिश्र जी, श्री अवधेश दुबे जी



 पुल के पहले बनकटा मिश्र गांव के पश्चिम में कभी खाली रहे स्थान की व्यावसायिक उपयोग की शुरुआत होते देखते ब्लोगर , ब्लोग्गर के मामा जी के सुपुत्र श्री रामप्रकाश शुक्ल जी, श्री उमेश मिश्र जी, श्री अवधेश दुबे जी


        पुल के उपर से लिया गया विहंगम दृश्य जिसमें बड़का गांव के पास का रेल का पुल दीख रहा है



पुल के उपर से लिया गया पास का दृश्य

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

बनकटा मिश्र के शिरड़ी के साई बाबा मन्दिर

साईंबाबा की  मंदिर में  स्थापित वास्तविक छवि 


साईबाबा मंदिर का बोर्ड 

निर्माणाधीन  साईबाबा मंदिर बनकटामिश्र 


साईबाबा के सामने श्रद्धानत ब्लॉगर एवं आदरणीय अवधेश दूबे जी 

       मै बहुत समय के बाद गांव गया तथा वहां की परिस्थितियों एवम आधारभूत संरचनाओं के विकास को देखा और महसूस किया कि समय अपना स्वाभाविक विकास का रथ चला रहा है ।
       धार्मिक क्षेत्र में एकमात्र आस्था का केन्द्र रहे रैनाथ ब्रह्म महाराज के अतिरिक्त दो अन्य मन्दिर का भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनता जा रहा है । उनमें से गांव के पश्चिम में स्थित शिरड़ी के साई बाबा मन्दिर भी एक है । वर्तमान में बहुत ही व्यवस्थित रुप से दोनों समय सुबह एवम शाम को पूजा एवम आरती होती है जिसका माइक पर प्रसारण भी होता है जिसमें गांव के लोग श्रद्धा से शामिल होते हैं । गांव के लोगों के लिये एक और अच्छा सा प्लेटफ़ार्म जिसमें रचनात्मक उर्जा का सदुपयोग हो सकता है । सभी प्रोमोटर्स को साधुवाद एवम शुभकामनायें ।

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

वर्षान्त एवम वर्षारम्भ के वयः संधि काल (संक्रमण काल) का उहापोह



वैसे तो मेरे ब्लोग्ग को कोई पढने वाला नहीं हैं। इसलिये मैं भी अपेक्षाओं के किसी दबाव  में नहीं रहता हूं । और साथ ही मुझे स्वयम से भी ज्यादा अपेक्षा नहीं होती है । लेकिन अन्यों के अच्छे ब्लोग्ग को पढ कर बहुत प्रसन्नता होती हैं । निश्चित रुप से अपने ब्लोग्ग को उसी तरह से सुरुचिपूर्ण, तथ्यपरक, वस्तुनिष्ठ और सबसे अहम बात कहूं तो कालजयी होते देखने की कपोलकल्पनायें मन के किसी कोनें में हिलोरे मारते मह्सूस करता  हूं ।
अपने मन में नियमित रुप से ब्लोग्ग लिखने की ख्वाहिश, योग्यता और परिस्थिति नहीं है। परन्तु अन्यों के अच्छे ब्लोग्ग को पढने पर मन को बहुत  खुशी मिलती है। न दैन्यम न पलायनम एक ऐसा ही ब्लोग्ग है. उसके पहले मैने  दालान नामक एक ब्लोग्ग को पसंद किया था परन्तु उसके ब्लोग्गर ने फ़ेसबुक पर नियमित रुप से संक्षिप्त सी टिप्पणी लिखने का मन बना कर दालान पर लिखना बंद सा कर दिया।
यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि अरुचिकर लिखने से अच्छा पढना ज्यादा श्रेयष्कर लगा। इसके बाद आता है कि क्या लिखा जाये । मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना के अनुसार विषयों की विविधता सामान्य बात है । मैंने सामयिक विषय को बहुत सामान्य विषय पाया है । परन्तु उसका विश्लेषण सतही, लकीर के फ़कीर वाला ही पाता हूं । यहां मैं वैज्ञानिक दृष्टिकोंण को शामिल किये जाने पर जोर देना चाहता हूं । असल में वैज्ञानिक होना लकीर से हट कर चलने के समान है जिसे हम क्रान्तिकारी कदम के रुप में भी पाते हैं। बहुत मुश्किल होता है जब हमारे विचार लगभग सबसे अलग और अकेला होता है।